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योग्य पुत्रों की कामयाबी के बीच वृद्धाश्रम में सिसक रहे 55 पिता

फादर्स डे पर विशेष

 


जौनपुर। शिक्षित संताने बड़े शहरों में व्यवसाय कर रहीं है, कोई सरकारी या निजी संस्थानों में उच्च पदों पर कार्यरत है, तो किसी के बेटे-बहू विदेशों में बेहतर जीवन जी रहे हैं। लेकिन इन षिक्षित संतानो के 55 माता पिता जौनपुर के सैयद अलीपुर स्थित वृद्धाश्रम में अपनी जिंदगी की सांझ बिता रहे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को काबिल बनाने में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। अपनी युवावस्था मे अपनी खुषियों पर बुल्डोजर चला कर दफन कर अपने बच्चों के लिये पैसा बचाये रखा ताकि उन्हे अच्छी षिक्षा देकर योग्य बनाया जा सके ताकि वे सरकारी गैर सरकारी संस्थानो मे अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें अच्छे व्यवसाय कर अपार धन कमा सकें। लेकिन इन्हे तमाम उपलब्धियां मिली तो माता-पिता के लिए इनका समय, सम्मान और अपनापन कहीं खो गया है। बच्चों की सफलता में ही पिता अपनी खुशी तलाशता है लेकिन जब वही पिता उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचता है तो उसे सबसे ज्यादा जरूरत अपने बच्चों के साथ और सहारे की होती है। पिता ने जिनको उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उन बच्चों के पास आज अपने बुजुर्ग माता के लिये आधुनिक जीवनशैली और व्यस्तताओं के बीच समय नहीं बचा। अब तो मौत तक वृद्धाश्रम के अलावा और कोई सहारा नही।
जौनपुर के सैयद अलीपुर वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की आंखों में आज भी अपने बच्चों के प्रति शिकायत कम और मोह ज्यादा दिखाई देता है। वे आज भी उनकी खुशहाली की दुआ करते हैं, भले ही वे खुद अकेलेपन और उपेक्षा का जीवन जी रहे हों।
एक बुजुर्ग की पीड़ा शब्दों में छलक पड़ती है बेटे को इंजीनियर बनाने के लिए खेत तक बेच दिए, लेकिन आज उसके घर में हमारे लिए जगह नहीं। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम माता-पिताओं का दर्द है जो अपने ही घर में पराए हो गए।
यहां रहने वाले कई बुजुर्ग रोज मुख्य द्वार की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं कि शायद आज उनका बेटा या बेटी उनसे मिलने आ जाए। कई बार मोबाइल की घंटी बजती है तो दिल धड़क उठता है कि शायद अपनों का फोन होगा, लेकिन अक्सर यह उम्मीद भी टूट जाती है।समाज में अक्सर बच्चों की शिक्षा और सफलता पर गर्व किया जाता है, लेकिन असली सफलता केवल ऊंची नौकरी या बड़ा कारोबार नहीं है। असली सफलता तब है जब व्यक्ति अपने माता-पिता को सम्मान और सुरक्षा दे सके। फादर्स डे पर सोशल मीडिया पर हजारों संदेश लिखे जा रहे हैं लेकिन वृद्धाश्रमों मे अपने प्यारे बच्चों के आने का इन्तजार करती आखों का कोई जिक्र नही है।

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